‘जंगलदंश’ उपन्यास के बारे में कुछ कहने से अच्छा है, कुछ न कहा जाये तथा यह भी न बताया जाये कि जंगलदंश उपन्यास है या लम्बी कहानी है। पर इतना कहना जरूरी है कि आज के आलोचनात्मक व विखंडनवादी समय में, जहां कदम कदम पर कुदरती चिंतन तथ व्यवहार को ठेंगा दिखाया जा रहा हो, मानवीय समीपताओं को किसी भी तरह से नष्ट करने व मिटा देने के कूट प्रयास किये जा रहे हों, कृत्रिम संप्रभुताओं के द्वारा व्यक्ति की नैसर्गिक संप्रभुता को दमित व उत्पीड़ित किया जा रहा हो, जहां आदमी को आदमी की तरह जीने, मरने की कुदरती परिस्थितियां न उपलब्ध कराकर उसे उपभोक्ता वस्तु में तब्दील किया जा रहा हो, जहां चित्त, चेतना तथा चिंतन के हसीन बाजार हों और उस बाजार में विचार व दृष्टि को ( प्कमं ंदक अपेपवद ) बेचे तथा खरीदे जाने के कौशल दिखाये जारहे हों, ऐसे में ‘जंगलदंश’ की कुदरती कथा लिखना जरूरी था। ऐसे खतरनाक समय में कथा के माध्यम से यह देखना भी जरूरी था कि यह जो ‘जंगल में मंगल’ या‘अहा ग्राम्य जीवन’ की राग अलापने, किसानों को फसल की दुगनी आय दिला कर उनकी आत्महत्या रोकने वाली साहित्यिक व खासतौर से राजनीतिक व्यवहारलिपि है, उसमें इन दोनों ‘पदों’ का कितना मान, सम्मान व आदर है?
किसे नहीं पता कि जंगल में जंग है तो गॉव में जाति है, गोत्रा है, अगड़ा है, पिछड़ा है, मंडल है कमंडल है, इनके अपने अपने दांव हैं पर ‘अहा ग्राम्य जीवन’ तथा ‘मंगल’ कहीं नहीं है। हर तरफ जंग ही जंग हैं, दांव ही दांव हैं। जंगल में जंग हैं तो गॉव में दांव हैं। जंगल हैं, तो कारखानों के द्वारा उपजाये गये विस्थापन के दंश हैं, गॉव हैं तो जमीन है, जमीन है तो उसके होने न होने के कारण हैं, मालिकाना है, विरासत है, वसीयत है और कब्जे हैं तथा जब ये सब हैं तो थाना है, कचहरी है यानि बहुत कुछ है। जमीन, जोरू और जर(संपत्ति) का सीधा मतलब है झगड़ा, झगड़ा है तो थाना है कवहरी है, मुकदमा है। बाहरी दुनिया यानि प्रशासकों की दुनिया में विवेकाधिकार तथा विशेषधिकार हैं। गोया हर समाज बटा हुआ है चाहे नागर हो या ग्रामीण उसी के अनुसार मानवनिर्मित अधिकार भी विभाजित हैं समझना यही है कि ये विभाजन समतावादी समाज के अनुकूल हैं या समाज को पन्द्रहवी शताब्दी में ले जाने वाले हैं। अगर ऐसा ही है फिर हमारी सभ्यता किन अर्थों में आधुनिक है?जमीन किसी ने जनमाया नहीं, उगाया नहीं, पहाड़ किसी ने रचा नहीं, नदियों को किसी ने बहाया नहीं। अब तो ये कुदरती सच सत्ताप्रबंधनके लिए जटिल सवाल बन कर किसिम किसिम की संस्कारलिपि भी रचने लगे हैं, खतरा इसी नये किस्म की संस्कारलिपि से है। दुखद है कि इस संस्कारलिपि से मानव समीपतायें कांप रही हैं, कांप तो जंगलदंश की कथा भी रही है, आइए देखते हैं, आगे क्या होाता है?वैसे कथाओं का क्या है, चाहे जितनी कही जायें या सुनी जांये उनका सामाजिक बदलावों के सन्दर्भों में कुछ विशेष असर पड़ा हो ऐसा नहीं जान पड़ता। गोदान का होरी जीवित समाज का प्रतिनिधि बन गया हो नहीं देखा गया। अगर उस तरह के चरित्रा देखे भी गये तो उन्हें बाजार ने डस लिया, फिर वे होरी से बदल कर कुछ और हो गये। गायब हो गया होरी और बाजार की चमक में कहीं खो गया, अब उसे कौन गढ़े या रचे? पूंजीवादी सत्ता प्रबंधन ने उन्हें भलमानुष नहीं रहने दिया, उपभोक्ता संस्कृति ने उन्हें किसी कमोडिटी में बदल दिया। बाजार की कमोडिटी बने लोगों के बीच मानुष रहना आसान भी तो नहीं। आसान होगा भी कैसे, बाजार में तो किसी कार्टून की तरह इधर से उधर उड़ते रहना मजबूरी है।जंगल दंश की कथा आपके सामने है, देखिए यह कथा आपको प्रभावित कर पाती है या नहीं। अगर इस कथा के माध्यम सेआप वामउग्रवाद के क,ख,ग, से वकिफ हो जाते हैं फिर तो यह सार्थक कथा होगी।हिन्सा तथा अहिन्सा दो छोर हैं वामउग्रवाद को समझने के लिए। कम से कम भारतीय संस्कृति किसी भी हाल में हिन्सा की वकालत नहीं करती। वामउग्रवादी चिन्तन भारतीय व्यवहार संस्कृति की भाषा नहीं है। समाज बदल के लिए हिन्सा का सहारा लेना यह पद्धति भारत में मनोवैज्ञानिक व सामाजिक रूप से त्याज्य है, इस पद्धति में सामाजिकता तो हो ही नहीं सकती। आज के समय को सोलहवीं शदी में बदल देना या बदलने का प्रयास करना सिवाय बेवकूफी के और कुछ नहीं।आशा है मेरे पिछले उपन्यासों की तरह प्रस्तुत उपन्यास को भी आपकी मुहब्बत मिलेगी। आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा में...जून- 2019 राबर्ट्सगंज,सोनभद्र,उ.प्र.भावना प्रकाशन
109-पटपड़गंज गॉव, दिल्ली-110091
मो...8800139684, 9312869947
प्रथम संस्करण 2022
मूल्य..400.00
जंगल दंश का पहला अश----
‘लाईन में लगना और लाइन बन जाना,
अलग अलग बातें हैं, यानि कथा आगे है’
मनीष देर रात तक घर लौटा। वह बाहर दोस्तों से घिर गया था। दोस्त उसे समझा रहे थे कि चुनाव में हार, जीत तो होती रहती है, उससे घबराना नहीं चाहिए, पर उसके घबराने का कारण दूसरा था, जिसे वह दोस्तों को बताना नहीं चाहता था।
मनीष घर में घुसते ही अवाक रह गया, उसे लगा जैसे वह अपने घर में न हो कर किसी दूसरे के घर में घुस गया हो, जहां होने का कोई मतलब नहीं... इस घर में तो वह कभी आया ही नहीं था। पता नहीं कैसे आ गया है। उसे विगत का सारा कुछ ख्याल आता जा रहा है, उसे भूलना चाहे तो भी नहीं भूल सकता, कुछ दूसरी भूल जाने लायक बातों की तरह, जिन्हें वह कबका भूल चुका है। उसकी यादें उसे नोचने चोथने लगी हैं, जबाब मांगने लगी हैं... यह पहला अवसर है जब वह अपनी यादों से मुठभेड़ करने की स्थिति में नहीं है। चार साल पहले ही उसने अपना घर बनवाया था, यह मानकर कि शहर में रहना हर हाल में ठीक होता है। किसे नहीं पता कि घर बनवाना आसान नहीं होता, वह भी शहर में, फिर भी मनीष ने शहर में घर बनवाया। कुमुद भी तो घर बनवाने के लिए जिद्द कर रही थी।उसे पता था कि कुमुद गॉव मंें नहीं रह सकती, उसने गॉव देखा नहीं है। जब से उसने खुद को जानना और समझना शुरू किया है, तब से शहर में ही रह रही है। पढ़ाई लिखाई सारा कुछ, उसने शहर में ही किया है। एक बार कुमुद किसी गॉव में गई थी, अपने पापा के साथ। गॉव में कोई मीटिंग होनी थी, विस्थापन का मामला था, एक प्राइवेट कारखाना बनवाने के लिए गॉव वालों को उजाड़ा जाना था। कारखाने को तीन सौ एकड़ जमीन चाहिए थी और सरकार ने उसे देने के लिए जो भी कानूनी प्रस्ताव वगैरह होते हैं, पास कर लिया था। सारा कार्यक्रम सरकार ने आनन फानन में तय कर लिया था और किसी को कानो कान खबर तक नहीं लगी थी। कुछ महीनों में ही गॉव वालों को उनकी जन्मभूमि तथा कर्मभूमि से उजाड़ दिया जाना था। यह सब करने में कमजोर से कमजोर सरकार भी बहुत मजबूत व ताकतवर हुआ करती है। चाहे वह अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के मामलों में विश्वबैंक तथा संयुक्त राष्ट्रसंघ के सामने, किसी अनाथ की तरह हाथ जोड़े खड़ी रहती हो, इतना ही नहीं, सारी दुनिया में घूम घूम कर देश की सुरक्षा के नाम पर घातक हथियारों, मिजाइलों वगैरह की भीख मांगा करती हो फिर भी देश के आंतरिक मामलों जैसे गॉव के गरीब किसानों के विस्थापन संदर्भाें में या दूसरे तरह के शोषणों के मामलों में, भीख मांगने वाली सरकारें भी अपनी जनता के साथ जघन्य से जघन्य क्रूरताएं बरतती रहती हैं।तकरीबन दस गॉवों को उजाड़ा जाना था, गॉवों के लोगों को विस्थापित किये जाने के औचित्य को साबित करने के लिए सरकार के पास ढेरों कानून थे। उन कानूनों में जो भी दरारें थीं उन्हें सरकार ने संसदीय सहमतियों, एवं विधिक संस्तुतियों से पाट लिया था। प्रशासन ने गॉवों को उजाड़े जाने की नोटिस भी तामिल करवा लिया था। नोटिस में साफ लिखा था कि जिन्हें आपŸिायां करनी हों, वे एक माह के भीतर करें नहीं तो माना लिया जायेगा कि किसी को कोई एतराज नहीं है, फिर सारे प्रकरण को एकतरफा ढंग से निपटा लिया जायेगा।गॉव वालों को नोटिस वगैरह के बारे में कुछ पता नहीं था... नोटिस कब आई, किसने भेजा, सारा कुछ रहस्य था। अचानक एक दिन गॉव की नापी होने लगी, तब गॉव वालों को पता चला कि वे उजाड़े जांएगे।विस्थापन वाले कामों को किये जाने की ऐसी ही परंपरा है। पहले नोटिस भेज दी जाती है। नोटिस के जबाब आते हैं। जिन्हें पता होता है कि जबाब दिया जाना है, वे जबाब दे देते हैं। जिन्हें नहीं पता होता वे जबाब नहीं दे पाते। जो जबाब आए होते हैं, कहा जाता है कि जबाबों के परिप्रेक्ष्य में नोटिस का निस्तारण होता है। जबकि जबाबों के निस्तारण की परंपरा ने कभी समाज को उल्लेखनीय लाभ नहीं पहुंचाया है। मान लिया जाता है कि सरकारें जो कुछ भी करती, कराती हैं वह सब राष्ट्र हित में समाज और अपनी जनता के लिए ही, फिर सरकारी काम से किसी को कैसे नुकसान हो सकता है?कुमुद को जाने कैसे उस दिन गॉव अच्छा लगा था। वहां के लोग उसे सरल और सीधे लगे थे, पर उसे वहां गुस्सा भी खूब खूब आया था। ऐसे सरल और सहज लोगों को जाने कैसे उजाड़ने के बारे में सरकार निर्णय ले रही है? क्या तमाशा है, जो कई कई शहरों में काबिज हैं, कई कई धन्धों को हथियाए बैठे हैं, उन्हें नहीं उजाड़ रही? उजाड़ रही ऐसे लोगों को जिनके पास इस गॉव के अलावा कहीं शरण नहीं...वह तो अपने पापा पर ही गुस्सा हो गई थी.....‘पापा यह क्या है? आप मीटिंग करके यहां से लौटने के लिए सोच रहे हो। आपके मित्र कामरेड भी चले गये, उनमें से एक कामरेड तो कार्यक्रम के संयोजक से कार का किराया भी मांग रहे थे, बोल रहे थे, कार का किराया दे दो, दसके अलावा हमलोगों को कुछ नहीं चाहिए।’‘अरे वही, जो लखनऊ विश्वविद्यालय वाले हैं, जिनका बहुत बड़ा नाम है, उनके साथ जो लेखक किस्म के एक आदमी थे, अभी उनकी एक किताब ‘खामोशी का वैश्वीकरण’ प्रकाशित हुई है, जिसकी समीक्षा मैंने साहित्य की चर्चित पक्षीनामधारी पत्रिका में पढ़ी है। वे मना कर रहे थे...‘जाने दो भाई, गॉव वाले रूपया कहां से देंगे। हमलोग आपस में खर्चा बांट लेंगे। तीन तीन सौ या चार चार सौ एक एक आदमी पर पड़ेगा और क्या। साथ ही साथ वे सभी लोगों को रोक भी रहे थे, काम तो यहां हैं, जनता केबीच में, इनकी लड़ाई को आगे बढ़ाना है, फिर यहां से लौटने का क्या मतलब। बेचारे गॉव वाले क्या करेंगे, सरकार का विरोध करना आसान नहीं होता। सरकार के पास तमाम तरह की ताकतें होती हैं, जो जनता के मन को कमजोर तथा लचीला बना दिया करती हैं। फिर जनता किसी छुई मुई माफिक अपनी ही छुअन से डर कर, खुद को अपने अपने भाग्य के रहस्यों में डुबो लिया करती है।मीटिंग में जो बाहरी लोग आए हुए थे वे गॉव में रुकने वाले नहीं थे। वे भाषणों को बेचने वाले सौदागर थे। ऐसे तिजारती लोग भला उस गॉव में रुक कर गॉव वालों के साथ लाठी डंडंे क्यों खाते। मीटिंग खत्म हुई और वे चले गये। कुमुद ने अपने पापा पर व्यंग्य किया....‘पापा आपको जाना हो तो जाइए, मुझे इन गॉव वालों को इस हालत में छोड़ कर नहीं जाना’ कुमुद लड़ गई अपने पापा से..पापा तो पापा, उन्हें अपने अनुभवों से हासिल ज्ञान पर गर्व था..‘क्या बोल रही तूं, का करेगी इस गॉव में रुक कर, जानती है इस इलाके के बारे में, यह क्षेत्र नक्सलाइटों का है, यहां आदमी नहीं, बन्दूकें बोलती हैं, यहां बन्दूकें कहानियां और कवितायें लिखती हैं। यहां रुकना ठीक नहीं होगा और गॉव वालों को भी कुछ लाभ नहीं मिलेगा।’‘पापा आप चाहे जो सोंचें, गुनें, पर मुझे इस गॉव से बाहर नहीं जाना। मैं जानती हूॅं कि गॉव वालों को इस समय मेरी आवश्यकता है, और अगर नहीं भी है तो मुझे मालूम है कि गॉव वालों के साथ रहने की आवश्यकताओं को मैं कैसे रच व गढ़ सकती हूॅं। इस परेशान गॉव में मैं अपनी उपयोगिता सिरज लूंगी’‘तो तुम्हें वापस नहीं लौटना, तूं यहां रुक कर करेगी क्या? कोई प्लान है क्या तेरे पास?’‘फिलहाल तो नहीं, प्लान पहले से बना कर क्या होगा? प्लान तो परिस्थितियों के आधार पर बनाना अच्छा होता है।’‘पापा शहर लौटने के लिए आप कैसे बोल रहे हैं? आपने ही तो मुझे सिखाया है कि अत्याचारों से लड़ना हर समझदार के लिए आवश्यक है, चाहे अत्याचार खुद के या किसी गैर के ऊपर हो। अत्याचार तो सिर्फ अत्याचार होता है, अत्याचार का प्रतिकार न करना, खामोश रहना, यह अत्याचार करने से भी भयानक है। आपकी उस सीख का क्या हुआ पापा? ‘आप कहा करते थे, जनता की लड़ाई जनता के द्वारा, उसकी अगुआई भी जनता के द्वारा। प्रताड़ित किये जाने वाले लोगों को वुद्धिजीवियों द्वारा वैचारिक सहायता देनी चाहिए, जिससे लड़ाई की धारा अराजक न होने पाये। मैं तो आपके साथ नहीं लौटने वाली। गॉव वालों को असहाय छोड़ कर मैं नहीं जा सकती पापा।’कुमुद की बातें प्रोफेसर आलोकनाथ को बहुत बुरी लगी थीं...‘लगता है, कुमुद मनबढ़ होती जा रही है और अपने लिए हुए फैसलों के प्रति कट्टर भी।’बहुत कुछ कुमुद के बारे में सोचने लगे थे आलोकनाथ। जैसे यही कि कुमुद को खुली सोचों का नागरिक नहीं बनने देना चाहिए था। यह तो अतुकांत कविता की तरह मर्यादा के नियंत्रणों को तोड़ रही है। इसे पता ही नहीं कि जीवन जीने के तरीकों में आत्मनियंत्रण की भूमिका होती है। अभी से ही मनमानी पर उतर आई है, बोल रही है, वापस नहीं लौटना। मेरी समझ में नहीं आ रहा यहां रुक कर करेगी क्या? क्या आन्दोलन चलाएगी? क्या करेगी आखिर यहां रुक कर?‘नहीं तुझे मेरे साथ चलना ही होगा, मेरे बारे में सोचो न सोचो, कम से कम मनीष के बारे में तो सोचो, उसे बुरा लगेगा।’सख्त हो गये थे आलोकनाथ, उनकी ऑखें लाल होने लगीं थीं और चेहरे पर लोहे सी गर्मी पसर आई थी। एक दम से लाल लाल, तपते तवा माफिक। होठ सूखने लगे थे, उंगलियां हरकत में आ गई थीं जैसे कुमुद को मार ही देंगे पर उन्हांेने कुमुद को कभी मारा नहीं था, मारना तो दूर गुस्सा कर डांटा भी नहीं था। जब कभी कुमुद की मॉ कुमुद की युवा शरारतों पर डांट दिया करती थीं, तब वे पत्नी पर बरस पड़ते थे। आलोकनाथ ने कुमुद की तेज तर्रार छाया में छरहरा जवान लड़का देखा था, समय से मुठभेड़ करने वाला तथा अपने पैरों पर खड़ा होकर आसमान में छेद करने वाला, साथ ही साथ अपने हित अहित के द्वन्दों को अनुकूलित करने वाला, पर यह कुमुद तो जाने क्या सोच व गुन रही है।‘आन्दोलन करेगी, गिरफ्तारी देगी, नारे लगायेगी, इन गॉव वालों के साथ। इसने मुझसे कुछ नहीं सीखा। इसे तो यह भी नहीं मालूम कि लड़ाइयां विचारों के औजारों से लड़ी जाती हैं... लड़ाई लड़ने के लिए विचारों को जांचा परखा जाता है, फिर युद्ध की चुनौती स्वीकार की जाती है, तूं तो पहले ही चुनौती देने लग गई हो।’आलोकनाथ छटपटाती सोचों में थे, कुमुद को दुबारा आदेशित किये...।‘चल मेरे साथ, यहां नहीं रुकना है’पर कुमुद को तो खुद को प्रमाणित करने वाली दुनिया दीख रही थी, शहादत वाली, वलिदान वाली, सिर्फ अपने लिए क्या जीना, जिया तो दूसरों के लिए जाता है। उसने आलोकनाथ से साफ बोल दिया कि उसे नहीं लौटना तो नहीं लौटना।कुमुद तो अपने पापा के प्रति पहले से ही सचेत थी और उसने तय कर लिया था कि उसे क्या करना है तथा कैसे करना है? वह अपने पापा को लगातार समझने की कोशिश कर रही थी, पर समझा नहीं पा रही थी। कुछ समय बाद तो वह उनके बारे में बहुत कुछ जान गई थी।वह उन कामरेडों को भी संदेह से देखने लगी थी, जो वैचारिक ज्ञान अर्जन के लिए उसके पापा के पास आया करते थे। क्या उन्हें नहीं पता है कि ये जो कामरेड आलोकनाथ हैं, वे अक्षरों के युद्धभमि के योद्धा हैं...। इनके तमाम भाषण कामरेडों के द्वारा संसदीय प्रणाली स्वीकार करने के बाबत थे। जो काफी महत्वपूर्ण तथा गंभीर थे। वे एक ऐसे कामरेड हैं जिनसे कोई माई का लाल तर्कों में जीत नहीं सकता। इनके पास बने बनाए तर्कों व मन्सौदों का खजाना है। संसदीय लाईन पर चलने के औचित्य को कामरेड आलोकनाथ ने तत्कालीन परिस्थितियों में अनिवार्य बताया था तथा उसे समाज बदल का कारगर औजार भी प्रमाणित किया था। देश भर में बिखरे कामरेडों को जान पड़ा था कि उनके बीच आलोकनाथ के रूप में कोई देवदूत है, फिर तो वे संसदीय लाईन को समाज बदल का कारगर तरीका मान लिये थे।पढ़ाई के अन्तिम वर्ष में एक दिन कुमुद ने अपने पापा को छेड़ा था.....‘पापा हरावल दस्ता क्या होता है? क्या आप कभी इस दस्ते में रहे हैं?’आलोकनाथ पसीने से सरोबार हो गये थे, तत्काल उनका ज्ञान बौना पड़ गया था तथा उŸार देने में असमर्थ हो गये थे.कुमुद ने दुबारा पूछा था...‘पापा क्या होता है, हरावल दस्ता?’‘इसे लड़कू दस्ता बोलते हैं बेटा’‘कैसा लड़ाकू दस्ता?’‘अरे उनका दस्ता जो क्रूर हुकूमत बदलने के लिए हिंसा का सहारा लेते है.. सामाजिक बदलाव की लड़ाई लड़ने वाले लड़ाकू दस्ते को, हरावल दस्ता बोलते हैं, पर यह सब तूं काहे पूछ रही है?’‘बस ऐसे ही पापा, कोई खास बात नहीं, मैं जानना चाह रही थी कि आपकी लाईन क्या है? सुना है आप भी कभी भूमिगत थे और जनचेतना के हरावल दस्ते में रहे थे। अब आप संसदीय लाईन पर हैं, वैसा कुछ नहीं कर रहे हैं जिससे भूमिगत रहना पड़े, इसीलिए पूछ रही हूॅं पापा।’आलोकनाथ कुमुद का चेहरा देखने लग गये थे। उन्हें समझ आ रहा था कि कुमुद कोई चुनमुन चिरैया नहीं है, इसकी ऑखों में तरतीब से जलने वाली आग है, ऐसी आग जो बनावटी तथा सजावटी चेहरों को भस्म कर दिया करती है। आलोकनाथ कुमुद के चेहरे पर अपनी ऑखें नहीं टिका पाये थेे। उन्हांेने अपना मुंह आलमारी में सजा कर रखी किताबों की तरफ घुमा लिया था।आलमारी में ढेर सारी किताबें रखी हुई थीं। वहां ऐसी भी किताबें थीं जिसमें दुनिया में हो चुके सभ्यतागत बदलावों को विश्लेषित करने वाले खोजपूर्ण आलेख प्रकाशित थे। उनमें खास बात यह भी थी कि उन बदलावों के तरीकों के विशद वर्णन थे। आलोकनाथ उन वर्णनों को जब तब पढ़ा करते थे और अपनी मानसिक ऊर्जा बढ़ाया करते थे। उनमें कुछ आलेख ऐसे भी थे जिनमें उनके करतबों का प्रतिबिम्ब दिखता था। जिन्हें पढ़ कर वे घबरा जाया करते थे और आत्मपरीक्षण करने लगते थे।‘नहीं,ं नहीं, वे संशोधनवादी नहीं हैं, संशोधनवादी तो उन्हें कहा जाना चाहिए जो सŸााप्रबंधन के समर्थक हों। ठीक है, वे हरावल दस्ते में नहीं हैं, समाज बदलने के लिए हिन्सा का समर्थन नहीं करते पर वैचारिक लड़ाई में तो वे किसी योद्धा से कम नहीं हैं। उन्हांेने सŸाा का कभी समर्थन नहीं किया।’आलोकनाथ अकेले शहर लौटे, कुमुद आलोकनाथ के साथ नहीं लौटी, वह गॉव में ही रह गई। गॉव में गई तो गॉव वालों का बन कर रह गई। उनके आन्दोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बन कर। वह मनीष के बारे में आश्वस्त थी कि उसे समझा लेगी, सो उसे मनीष की चिन्ता नहीं थी।मनीष परेशान, परेशान था, आखिर कुमुद कहां चली गई? वह कभी इस तरह से बाहर कहीं नहीं रुका करती थी, चाहे जितनी रात हो जाये, घर अवश्य ही लौट आती थी। उसने आलोकनाथ को फोन मिलाया...‘सर! कुमुद नहीं आई क्या अभी तक।’‘हां वह वहीं गॉव में रुक गई है, उसे लगता है उसकी जरूरत गॉव में है।’‘कब तक वापस लौटेगी? कुछ बताया है क्या?’‘नहीं, इस बारे में उससे कोई बात नहीं हुई’मनीष लगातार कुमुद को फोन मिला रहा था पर उसके मोबाइल का स्वीच आफ चल रहा था, परेशान हो कर उसने आलोकनाथ से पूछा था।मनीष को अपने घर में भला नहीं लग रहा था। वह तो पहले से ही चुनाव की हार के गम में डूबा हुआ था। सारी जमा पूॅजी उसने चुनाव में फूंक दिया था, इतना ही नहीं गॉव की कुछ जमीन भी बिक गई थी। ऐसे तनाव भरे समय में उसके लिए कुमुद ही सहारा थी। वह मान कर चल रहा था कि वह जिन्दगी की सारी उलझनों को कुमुद के साथ रहते हुए सुलझा लेगा। देर रात तक वह कुमुद की प्रतिक्षा करता रहा था। नींद ने उसे कब जकड़ लिया, उसे पता ही नहीं चला। नींद खुलने पर उसने देखा कि घर के सारे दरवाजे खुले हुए हैं...‘कोई अनहोनी नहीं हुई?’ मनीष दरवाजे बन्द करना भूल गया था।कुमुद की प्रतिक्षा करते करते सात दिन गुजर गये। कुमुद का फोन नहीं आया और न ही उसका फोन मिल रहा था। मनीष घबड़ा गया, हुआ क्या आखिर? ऐसा तो कुमुद कभी नहीं करती थी, कहीं बीमार तो नहीं हो गई, गॉव का पानी लग गया होगा या मच्छरों ने काट लिया होगा।मनीष अखबारों में लगातार पढ़ा करता था कि गॉव वालों के सक्रिय विरोध के कारण पहड़िया टोला में कारखाना बनना मुश्किल हो गया है। कई बार ग्रामीणों तथा पुलिस के बीच हिन्सात्मक झड़पें हो चुकी हैं। कई ग्रामीणों की गिरफ्तारियां भी की गई हैं। कहीं कुमुद भी गिरफ्तार तो नहीं हो गई?मनीष ने एक दिन आलोकनाथ से कुमुद के बारे में दुबारा पूछा था पर उन्हें भी कुमुद के बारे में कुछ नहीं पता था। वे कुमुद से नाराज थे, सो उसका हाल अहवाल नहीं ले रहे थे। आलोकनाथ ने तो कुमुद को फटकार ही दिया था।‘जा जो करना हो कर, तुझे मरना है तो मर। मैंने तो सोचा था कि किसी कालेज में लगवा दूंगा। कालेज के लिए लेक्चररों की नियुक्तियों वाले चयन समितियों में बहुत सारे लोग मेरे हैं। किसी को बोल दूंगा, पर नहीं, तुझे तो क्रान्तिकारी बनना है तो बन। तुझे कौन समझाए कि हमारे देश की समाजार्थिक परिस्थितियां क्रान्ति के अनुकूल नहीं हैं। सामाजिक क्रान्ति का अभियान चलाने के लिए यहां के लोगों में वह गुस्सा नहीं है जो होना चाहिए। किसी खास मुद्दे पर आकस्मिक ढंग से गुस्सा हो जाना तथा सामाजिक बदलाव के लिए सŸाा के प्रबंधकीय तकनीकों पर गुस्सा हो जाना, दोनों बातें अलग अलग होती हैं।... क्रान्ति के लिए सŸााप्रबंधन के तकनीकों पर गुस्सा आवश्यक है जो दूर दूर तक भारतीय समाज में नहीं दीख रहा। हम भारतीय लोग तटस्थता और मौन के सनातनी पूजक हैं, हम सारी चीजों को दैवीय मानते हैं।’आलोकनाथ कुमुद के कारण तनाव में थे, तनाव में क्यों नहीं रहते, वही उनका सहारा थी। पर करते क्या कुमुद तो जुनूनी हो गई थी, जिसे आलोकनाथ एक गलत कार्यवाही मानते थे। कहते थे......‘उŸोजना शुचितापूर्ण चेतना को लील कर व्यक्ति को अराजक बना देती है, जाहिर है, अराजकता से समाज बदल नहीं हुआ करता’मनीष को कुमुद के बारे में आलोकनाथ से कोई जानकारी नहीं मिली। परेशान हो कर वह अपने गॉव चला गया, जहां आन्दोलन चल रहा था। वहां कुमुद नहीं थी। वह संतोष के साथ भूमिगत हो चुकी थी।’यह संतोष कौन है?’मनीष के लिए बहुत बड़ा सवाल था। संतोष के बारे में उसे जो जानकारी मिली वह चौंकाने वाली थी। मालूम हुआ कि संतोष बिहार का रहने वाला है और किसी भूमिगत संगठन का अगुआ है। संतोष के सक्रिय सहयोग व समर्थन के कारण गॉव वालों को अब तक नहीं उजाड़ा जा सका है। गॉव वालों की प्रशासन से कई बार आमने सामने की लड़ाइयां हो चुकी हैं और प्रशासन के लोग भाग खड़े हुए हैं...। लड़ाइयों के कारण प्रशासन ने फिलवक्त विस्थापन के काम को रोक दिया है।संतोष के बारे में जानकारी जुटाना मनीष के लिए खतरनाक भी हो सकता था, क्योंकि गॉव के लोग गरम थे, एक महीने पहले ही तो गॉव वालों की वन प्रशासन से आमने सामने की झड़प हुई थी। गॉव वाले आग में जलने के लिए तैयार थे, लगता था कि वे आग में से तप कर निकले भी हैं। लगता उनके लिए सामाजिक व्यवस्था, कायदा, कानून तथा समरसता का मामला, महज कुछ शब्द भर हैं जो समय के साथ भोथरे तथा निष्प्रयोज्य हो चुके हैं...।मनीष गॉव में जिस आदमी के घर पर था, वह भी खूब खूब डरा हुआ था। डरते हुए बताने लगा...‘बबुआ जाने का हो इस गॉव का, सिपाहियों को मारना ऐसा तो हमने नाहीं सुना था न देखा था बबुआ! पर उहो देखना पड़ा हमैं... संतोष गुरुजी ने ललकार दिया फिर क्या था गॉव के लड़के सिपाहियों पर टूट पड़े। लात जूते बरसने लगे, सिपाहियों पर। दो बार तो पहले भी ऐसा हो चुका था बबुआ। बीसों लोग गॉव के गिरफ्तार हो चुके हैं। संतोष गुरुजी और उनके साथ रहने वाली मेम साहब जाने का लगती हैं, गुरु जी की? हमैं तो जान पड़ता है कि मेहरारू ही हांेगी। गॉव में मारपीट के बाद दोनों लोग जाने कहां भाग गये। उन दोनों लोगों का कहीं अता पता नाहीं है। हमरे गॉव के लड़कवे हैं न बाबूजी! संतोष गुरुजी को कउनो देवता बूझते हैं, ओन्हई के आगे पीछे लगे रहते हैं, लड़िकवन के कुछू बोलो तो गरम हो जाते हैं.....।‘बोलते हैं कि ई सब हम लोगन कऽ राज है, वन हमार, पहाड़ हमार, नदी नाला, ईहां जौन कुछ है, सब हमार है। बाहरी लोगन के हम लोग ईहां नाहीं आने देंगे।’‘जाने दो बबुआ का करोगे सब जानकर। हमार बात केहूॅ से जीन बताना, तोहैं भलमानुष बूझ कर हमने बताय दिए, नाहीं तो हम लोगन कऽ मॅुह सिलाय गया है। एक बात अउर है बबुआ! तूंहो ए गॉव से जल्दी भाग निकलो। पुलिस के लोग अगलै बगल होंगे। देख लेंगे तो तोहैं भी संतोष गुरुजी का साथी बूझ कर जेहल में डाल देंगे। भागो भागो बबुआ!’मनीष उस गॉव वाले की बातें सुन कर अनिर्णय की स्थिति में था, आखिर यह संतोष कौन है और कुमुद का उससे क्या लेना देना है? उसे विगत ख्याल आने लगा...वह भी तो पहले कुमुद को नहीं जानता था। हालांकि दोनों एक ही विश्वविद्यालय में पढ़ रहे थे। पर थे अलग अलग कालेजों में, अलग अलग विषयों में पोस्ट ग्रेजुएसन कर रहे थे। छात्र संघ के चुनाव के दौरान कुमुद उससे मिली थी, वह भी छात्र संघ की अध्यक्षी की प्रत्याशी थी। मनीष तो था ही। मनीष चुनाव जीत गया, उसे भारी समर्थन हासिल हुआ था। दूसरे नम्बर पर कुमुद थी। कुमुद ने मनीष को जीत की बधाई दी थी। फिर मिलने का सिलसिला जो चला तो चलता ही गया। दोनों साथ रहने लगे। साथ रहने में दोनों के सामने कोई दिक्कत नहीं थी, दोनों खुले दिमाग के थे और मानते थे कि नर और नारी के रिश्तों में सखी-सखा वाला मन ही आवश्यक होता है। दोनों वादाखिलाफी को बुरा मानते थे फिर तो उनके लिए विवाह का नाटक आवश्यक नहीं था। इसी सोच के कारण दोनों ने वस्तुतः विवाह भी नहीं किया। हां दोनों ने आलोकनाथ के चरण छू कर आशीर्वाद जरूर लिए थे और साथ साथ रहने लगे थे। कुछ दिनों में ही दोनों की सांसें व घड़कने एक दूसरे को सहलाने, चूमने लगीं थीं..।. जैसे उन्हें अलग होना ही नहीं है हालांकि वे अर्धनारीश्वर नहीं थे, पर थे, उसी के समरूप, एक दूसरे में विलयित।मनीष का सोचना था कि जिस तरह उसने छात्रसंघ का चुनाव जीत लिया था अपने व्यवहार और विचार के आधार पर, उसी तरह विधायकी भी जीत लेगा, पर नहीं जीत सका और हार गया। हार भी पांचवें नम्बर की। कुमुद ने चुनाव में मनीष के लिए जी जान लगा दिया था। जितना वह कर सकती थी।कुमुद के बारे में जानकारी लेकर मनीष शहर लौट आया, उसे लौटना ही था, का करता गॉव में... चार दिन बाद उसे एक चिठ्ठी मिली। वह चिठ्ठी पढ़ने लगा...‘प्रिय मनीष!मैंने तुझे गॉव में देखा, मुझे मालूम था कि तुम मुझे ढूढने जरूर आओगे, मैंने संतोष को तुम्हारे बारे में बता दिया था। संतोष तुझसे मिलना भी चाहता था पर सुरक्षा कारणों से हमलोग तुझसे नहीं मिल पाये। हम दोनों तुझे देख रहे थे तथा उस आदमी को भी, जो तुझसे बतिया रहा था।तुम एक अच्छे आदमी हो मनीष! ऐसा मैं कई बार संतोष को बोल चुकी हूॅं, तुझसे बहुत कुछ सीखने और जानने का लाभ मुझे मिला है, जिसे मैं कभी भूल नहीं सकती। अब संतोष के साथ रहते हुए मुझे रोमांचक अनुभव मिल रहे हैं...जंगल, नदी, नाले, पहाड़, पेड़, झाड़ियंा और चौड़े चौड़े हरियाई धरती के विशाल भूखण्ड, पŸाों का हरापन, उनका सरसराना, मादकता में डूब कर झूमना सारा कुछ देखो तो देखते रह जाओ। शायद तुमने पŸिायों से लदी टहनियों को, झूम झूम कर आपस में बोलते बतियाते देखा और महसूसा होगा। जंगल की मादकता में डूबना मुझे तो बहुत ही अच्छा लगता है।जानते हो मनीष! यह पत्र लिखते समय मैं पहाड़ की एक चोटी पर बैठी हुई हूॅं, इसे हिमगिरि का उŸाुंग शिखर समझ सकते हो, संतोष मुझे भीगे नयनों से देख रहा है, मैं शीतल प्रवाह की तरह संतोष को खुद में बहाए जा रही हूॅं, मजा यह कि वह भी मेरे प्रवाह के साथ बह रहा है।मनीष याद करो वे दिन, जब मैं तुम्हारे साथ तुम बन गई थी और तुम मैं बन कर मुझे दिल की अतल गहराई में डुबोए जा रहे थे फिर उस गहराई में अचानक हमदोनों तैरने लगे थे। याद हैं न वे दिन। क्षमा करना मनीष! मैं तुमसे बिना कुछ बताए ही यहां आ गई, मैं जानती हूॅं कि मुझे तुमको बता देना चाहिए था। यहां आने पर संतोष मिला तथा गॉव के लोग, जो परेशान हैं जिन्हें विस्थापित किया जाना है। मुझे लगता है कि गॉव वालों के लिए मैं कुछ कर सकती हूॅं। विस्थापन के खिलाफ एक सक्रिय मोर्चा बना सकती हूॅं, यानि कि एक लड़ाई लड़ी जा सकती है, सरकार की जनविरोधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के खिलाफ। कुछ ऐसी ही ऊर्जां संतोष में भी मैं देख रही हूॅ... यही ऊर्जा हासिल करने के लिए जाने कब से परेशान परेशान थी मैं...।‘बुरा मत मानना मनीष! समाजबदल की ऊर्जा से तो तुम भी लबालब हो पर तुम्हारी ऊर्जा में संभ्रांतता का घोल है। जिसमें दिमाग और कंठ का मिश्रण है, जबकि संतोष की ऊर्जा में पेट ही पेट है। पेट की धधकती आग है, वही आग जो मुझे चिनगारी बनने के लिए प्रेरित करती है, वही मैं संतोष की चेतना में देख रही हूॅं, पर एक बात साफ है कि आजादी पूर्वक जीवन जीने का रास्ता तुमने ही मुझे सिखाया है। जिसका परिणाम है कि मैं इस पत्र में वह सब लिख पा रही हूॅं जो मुझे नहीं लिखना चाहिए था, पर मुझे यकीन है कि तुम एक सचेतन आदमी हो, दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना जानते हो, यही तुम्हारी आदत तुम्हें मुझ पर नाराज होने से रोकेगी। तुम खुद को नियंत्रित कर यह प्रमाणित भी कर सकोगे कि तुम आजादी का सम्मान करना जानते हो, तथा समानधर्मा रिश्तों का निर्वहन भी।‘सच बताऊं मनीष! आज जिस लाईन का चुनाव मैं कर सकी हूॅं, वह तुम्हारी ही सीख है। तूंने ही सिखाया है कि मित्रता में झूठ बोलना अपराध होता है, सो सच सच बोल रही हूॅ...हम इस समय ऐसे मोड़ पर हैं, जहां तमाम तरह के आकस्मिक निर्णयों के लिए सलाह मशविरे की जरूरत पड़ती है। मेरे साथ तुम्हारा न होना काफी अखर रहा है, पर मैं तुम्हारी प्राथमिकताओं को जानती हूॅ...। सो तुमसे यह नहीं बोलूंगी कि तुम भी हमारे साथ जुड़ जाओ, फिर हम एक साथ मिल कर नया सबेरा देखने की कोशिश करंे...।खैर क्षमा करना साथी! और उस समय को भूलने की कोशिश भी, जिसे हम दोनों ने एक दूसरे में विलयित हो कर जिया था। संभव है कि अब तुमसे मुलाकात न हो, मैं जिस रास्ते पर चल पड़ी हूॅं उसके हर कदम पर मृत्यु थिरकती रहती है। एक निवेदन यह भी है कि हमारे बीच संबधों का जो अन्तर्लयन था, उसे प्रलय न समझना तथा प्रकृतिस्थ होने के संभव उपायों को आजमाते रहना। यहां मैं तुम्हारी स्मृतियों के मनोरम कौतुकों में गोते लगाती रहूॅंगी। हो सके तो पापा का भी ध्यान रखना।’पत्र लम्बा था, पत्र के एक एक शब्द मनीष को टुकड़ों में बांट रहे थे। मनीष विखंडित हो कर किसी कठिन कविता का हिस्सा बनता जा रहा था। उसे आने वाले समय के साथ कुमुद से जुड़ी यादों की संगति बिठाने का काम करना था तथा मान कर चलना था कि समय उससे आगे निकल चुका है। वह बीते समय में अब नहीं लौट सकता, उसके सारे दरवाजे बन्द हो चुके हैं...।पत्र पढ़ लेने के बाद मनीष चौंक गया...‘तो क्या कुमुद जिस ‘लाईन’ की बातें, बात बात में किया करती थी, वह ‘लाईन’ यही है। इसी लाईन पर वह चलना चाहती थी, यानि कि संतोष की लाईन। संतोष की लाईन ही अगर कुमुद को पसंद थी तो मुझसे जुड़ने का मतलब?’ क्या उसे नहीं पता कि ‘लाइन’ में लगना और ‘लाइन’ बन जाना अलग अलग बातें होती हैं’‘मुझसे वह जुड़ी तो उसे पता था कि मेरी लाईन का बाजार है और मैं छात्रसंघ का चुनाव जीत चुका हूॅ, वह विजेता के साथ थी, पराजित के साथ नहीं। अब तो मैं हारा हुआ, औसत दर्जे का आदमी भर ही हूॅ। भला मेरे साथ कुमुद कैसे रह सकती है? अगर उसे कहीं जाना था, तो चली जाती, यह क्या है कि बिना बताये ही चली गई। कुमुद को समझना चाहिए था कि ’आज का राजनीतिक समय पहले वाला नहीं है, आज तो केन्द्र की सरकार ही नहीं प्रदेशों की सरकारें भी वामपंथियों तथा जनवादियों के विचारों के खिलाफ हैं। वामपंथी व जनवादी शाक्तियों को जनता ने मौजूदा चुनावों में नकार दिया है।मनीष परेशान था। वह दोस्तों से कुमुद के बारे में क्या बताता, कि वह उसे छोड़कर चली गई है अपनी ‘लाइन’ बनाने के लिए।
कुछ अपने बारे में
मैं खेतिहर परिवार से हूं। गॉव में खेती की जमीन है। मेरे पुरखे भी खेतिहर रहे हैं तथा वे सदैव सŸाा द्वारा कुपोषित (दमित नहीं) रहे हैं।
मेरी प्राथमिक शिक्षा गॉव के प्राथमिक पाठशाला में हुई है फिर बाद में वाराणसी के काशी विद्यापीठ और बी.एच.यू. से हुई है। 60-70 के दौर में वाराणसी जाकर शिक्षा हासिल करना चुनौती की तरह था। मेरे गॉव में तब कोई स्नातक क्या इन्टरमीडिएट भी नहीं था। शिक्षा के लिए मेरे सामने न तो आर्थिक परेशानी थी और न ही वैचारिक। मेरे पिता जी अदना जमीनदार थे, घर की आर्थिक हालत ठीक थी हालत खराब हुई 1952 में जमीनदारी टूटने और सीलिंग लग जाने के बाद। वैसे भी पिता जी अपने समय में सबसे पढ़े लिखे आदमी थे, वे अंग्रेजी तथा उर्दू मिडिल पास थे, उन्हें रामचरित मानस तथा गीता का अच्छा ज्ञान था। एक प्रकार से वे दार्शनिक थे...एक बार उन्होंने मुझसे कहा था...‘‘यार रामनाथ! तेरा यह सूट (जिसे सिलवाने के लिए मैंने पिता जी से रुपया मॉगा था) कौन देखेगा? पढ़ने वाले लड़के तो किताबें देखेंगे फिर तेरा सूट देखने की उन्हें फुर्सत कहां? पिता जी के इस एक वाक्य ने मरे जीवन जीने के तरीके को ही बदल दिया...’’वकालत के दौरान मुझे लगा कि मैं उन कानूनों की पैरबी करने के लिए नहीं बना हूं जिसमें यातना की गंध भरी हो, मुझे न्यायशास्त्र के तमाम विधान खून में सने जान पड़ने लगे थे, ये तो केवल दमन के लिए हैं,,, वकालत के ब्यवहार में मुझे लगा कि मैं अपनी कानून की शिक्षाओं के आधार पर एक भी ऐसे बेगुनाह आदमी को नहीं बचा सकता जो निर्दोष है, अगर उसके खिलाफ गवाह प्रतिबद्ध हैं फिर तो उसे जेल जाना ही होगा। मैंने उसी दौरान गॉधी जी के हिन्द स्वराज्य को भी पढ़ा था फिर तो मुझे समझ आया कि ये जो मेरेे जैसे तमाम वकील हैं वे बेचारे तो बेमतलब उन कानूनों की भी पैरबी करते हैं जो जनता के दमन के लिए अंग्रेजों द्वारा बनाये गये हैं जिनका कोई अब मतलब नहीं... बहरहाल मैंने वकालत छोड़ दिया और खेती तथा असुविधा के प्रकाशन से जुड़ गया।मेरा स्वभाव या गुण पूरी तरह से कुदरती हैं, आमजन वाले, कŸाई विशिष्ट नहीं, उन्हीं की तरह सोचना, रहना, खाना और सोना तथा उन्हीं की तरह जीवन जीने के लिए अपनी परिस्थितियों से खुश रहना .. यानि जो है सब ठीक है, जीवन है तो सुख ही सुख हैं केवल इतना ही। वैसे भी स्वभाव या गुण कवेल स्वभाव या गुण होते हैं विशिष्ट नहीं, यह जो विशिष्ट या शिष्ट का मामला है अभिजनों का संबोधन है।ग्रेडुएसन के बाद मुझे महसूस हुआ कि मैं कुछ लिख सकता हूं फिर मैंने लिखना शुरू किया। मेरी पहली कहानी दैनिक ‘आज’ में प्रकाशित हुई थी। उस कहानी के पहले पाठक मेरे पिता जी थे, कहानी पढ़कर उन्होंने मेरी पीठ ठांेकी थी, वही पीठ ठोंकना मेरे लिए लेखन के प्रति प्रेरित करने वाला था, आज पिता जी नहीं है पर मुझे लगता है कि वे मेरे सामने हैं और मेरी पीठ ठोंकते हुए कह रहे हैं....‘‘अगर तुम्हारे लेखन का एक वाक्य भी जनता की बोली बन जाये तो तेरा लेखन सफल। तो मैं उसी आस में प्रयासरत हूं शायद मुझे कभी जन की मुहब्बत मिल जाये।’’सृजन का मामला थोड़ा गंभीर है। मैं लगातार सृजन के मूड में रहता हूं, कुछ न कुछ मन के भीतर चलता रहता है, आदिवासियों के साथ रहता हूं तो उनका जीवन, जीवन जीने के उनके तरीके मेरे मन व चिŸा को बराबर मथते रहते हैं, इनके लिए अगर मैं कुछ नहीं कर पा रहा तो कम से कम इनके जीवन संघर्षों को अक्षरों से तो संवारने का काम करूूं. सृजन के समय मेरे साथ कहानियों/ उपन्यासों के पात्र थिरकते रहते हैं। अक्सर वे मुझसे सवाल भी पूछते हैं... ‘‘पार्टनर ये सब तूं काहे लिख रहे हो, किसके लिए लिख रहे क्या तुझे नहीं पता कि मानव सभ्यता का जितना नुकसान शास्त्रों (किताबों) ने किया है उतना शस्त्रों ने नहीं।’’उपन्यासों के संदर्भ में मुझे कुछ नहीं बोलना चाहिए उसके बारे में तो समीक्षक/ आलोचक/पाठक बोलें, वे लिखें तो उचित रहेगा पर एक बात कहना जरूरी है कि आज के बाजारू समय में उपन्यास लिखना तो आसान है पर वह प्रकाशित हो जाए कठिन है। मैं तमाम ऐसे समर्थ रचनाकारों को जानता हूं जो बढ़िया लिख रहे है पर उन्हें प्रकाशन का अवसर नहीं मिल रहा तो यह समय साज-बाज वाला है, कुछ लोग ही हैं जो प्रकाशन की दुनिया के बादशाह हैं बकिया तो उनकी रेयाया(प्रजा) हैं...मेरा साहित्य जन-साहित्य है, जनता के लिए है, जनता का है तथा कुदरती मूल्यबोधों पर केन्द्रित है इस लिए उनके विषय वस्तु प्रकृतिमूलक हैं। जैसा कि मैं बार बार कहता हूं पूरी मानव सभ्यता के सामने योनिशुचिता यानि लैंगिक समानता, भूमि तथा संपŸिा के सवाल पहले से रहे हैं जो कमोबेश थोड़ी तब्दीलियों के साथ आज भी जस के तस हैं। एक साहित्यकार को इन सवालों से टकराने का प्रयास करना ही चाहिए।उपन्यास साहित्य में महिलाओं की स्थिति बहुत हद तक सकारात्मक हुई है जिससे विश्वास होता है कि आने वाले समय में महिलाएं लैंगिक भिन्नताओं की शिकार जैसी उपन्यासों में नहीं दिखेंगी, वे एक ऐसे पात्र के रूप में दिखेंगी जिनकी अपनी कथाभाषा, देहभाषा तथा संवादभाषा नर भाषा से अलग होगी तथा फिर वे बाजार की उपभोक्ता वस्तु बनने के बजाय वे अपनी अस्मिता से युक्त सभ्यता की अनिवार्य इकाई जान पड़ेंगी।साहित्य में क्राान्तिकारी बदलाव आ रहे हैं, पर कहानियां आज भी बाजारू मूल्यों की ओर ज्यादा झुकी दीख रही हैं। उन्हें बाजारू मूल्यों से पूरी तरह बाहर निकलना होगा तथा प्रकृतिमूलक आख्यानों के आस पास होना होगा।ग्राम तो अब रहे नहीं, गॉव तो तब थे जब गॉव में गोबर, माटी, कीचड़ तथा गाय बैल हुआ करते थे, पेड़ पौधे हुआ करते थे, अब तो गॉव कंक्रीट में ढलते जा रहे हैं, वहां सरिया, सीेमेन्ट, गिट्टी तथा बालू हैं। गॉव में बाजार की संकीर्णताओं के साथ उपभोक्ता बन जाने की स्थितियां पैदा हो गई हैं। जैसे जैसे गॉव बदले है वैसे वैसे वहां शोषण के रूप भी बदले हैं, अब ठाकुर साहब के आतंक वाले गॉव नहीं है। वहां थाना, पुलिस, वन प्रबंधन, राजस्व कर्मियों जैसे सरकारी लोगों के आतंक हैं। एक तरह से आतंक का गॉवों में विधिकीकरण हो गया है, और अब आतंक सरकारी हो गया है।मेरी औपचारिक शिक्षा अध्ययन से हुई है, किसिम किसिम की किताबें पढ़ता हूं तथा उन्हें गुनने का प्रयास करता हूं साथ ही साथ मैं उन लोगों से लगातार संपर्क बनाए रखता हूं जो प्रताड़ित है, शोषित हैं, विस्थापित हैं, उनके साथ रहते हुए उनसे जीवन जीने तथा जीते रहने की कला सीखने का प्रयास करता हूं। अगर ऐसा न करता तो शायद मैं ‘हरियल की लकड़ी’ ‘तीसरा रास्ता’, ‘ढूहवाली लछमिनिया’ या ‘सहपुरवा’ ही नहीं लिख पाता। ये सभी उपन्यास जंगल में रहवास करने वाले लोगों से मिली सीख व संवेदना से ही आकार पा सके हैं।भाषा को लेकर कभी हीनता बोध मुझे नहीं हुआ क्योंकि मुझे पता है कि अभिव्यक्ति का सर्वोŸाम मैं हिन्दी में ही दे सकता हूं।मेरे प्रारंभिक लेखन के पीछे प्रेरणा के रूप में मेरे बाबू जी (पिता जी) ही रहे हैं तथा मेरी ‘माई’(मॉ) रही हैं। मुझे अपनी मॉ के साहसी तथा सहयोगी चरित्र ने सदैव प्रभावित किया है।आज का किसान आर्थिक प्रयोजनों के संबध में विकल्पहीन है, उनके पास सिवाय खेती किसानी के कोई दूसरा विकल्प नहीं। अनाजों के उत्पादन से अधिक कठिन हो गया है अनाजों को उचित मूल्य पर बेचना। आज किसानों को बाजार की कठिन प्रतियोगिताओं में फसा दिया गया है जबकि किसान तो कुदरती अर्थप्रबंधन का आदमी होता है उसे बाजार की जटिलताओं व तिकड़मों के बारे में कुछ भी पता नहीं होता। वैसे भी खेती किसानी आज के समय में वही कर रहा है जो कोई मुद्राउत्पादक काम नहीं हासिल कर सकता। आज का समय मुद्राउत्पादन का है, अनाज उत्पादन का नहीं। गावों की हालत इसी लिए खराब है क्योंकि गॉव में सŸााप्रबंधन तथा अर्थप्रबंधन उन लोगों को रहने ही नहीं देता जो गॉवों को विकास के रास्ते पर ले जा सकते हैं। उन्हें गॉवों से छीन लिया जाता है. अब तो गॉवों में वही रहते हैं जो सिवाय खेती के कोई दूसरा मुद्राउत्पादक काम नही हासिल कर पाते। देखिए किसान तो पूरे उत्साह के साथ जीवन जीना चाहता है पर आज के समय की आर्थिक स्थितियां उनके अनुकूल नहीं, साहूकारों के कर्जों से अलग बैंकों के कर्जे उनके जीवन छीन रहे हैं इसे आप आत्महत्या बोलो चाहे कुछ और पर असल बात है कि आज का विषम अर्थप्रबंधन किसानों का जीवन छीन रहा है।समकालीन कथा लेखन तमाम बिडंबनाओं के बाद भी बहुत आगे बढ़ा है पर जमीन, संपŸिा तथा योनि भेद जैसे कुदरती सवालों से टकराने में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पाया है। हमें समझना होगा कि यह जो जमीन तथा संपŸिा का मामला है, उसके रख रखाव में एकाधिकार जैसी निजता का मामला है वह संभव बराबरी के रास्ते को बाधित करता है तथा वही जातिभेद, लिंगभेद, भाषाभेद उत्पादित करता है इतना ही नहीं मानव सभ्यता को संभव बराबरी की तरफ बढ़ने ही नहीं देता जिससे यह जो ‘पीर पराई’ वाली संवेदना है वह समाप्त हो जाती है। मेरा मानना है कि समकालीन लेखकांे के संपŸिा की निजता वाले सवालों को कथाओं के माध्यम से उठाना चाहिए।सवाल केवल तीसरा रास्ता की नायिका ‘सुधा’ का नहीं है, हरियल की लकड़ी की नायिका, बसमतिया, ढूहवाली लछमिनिया की नायिका लछमिनिया सहपुरवा की नायिका सुमिरिनी, अन्तर्गाथा की नायका सुशीला सभी नायिकाएं अलग अलग रूपों में मेरे दिल दिमाग में तो थीं पर यथार्थ में ये पूर्णरूप में कहीं नहीं थीं। हॉ इनके आंशिक रूप मेरे सामने यथार्थ में थे। कहीं कोई औरत नारा लगाती दिख जाती थी तो कोई थानेदार से झगड़ती दिख जाती थी तो कोई अदालत में खड़ी होकर मजबूती के साथ अपना पक्ष रखती दिख जाती थी। मैने देखी हुई उन औरतों की विभिन्न भूमिकाओं को कथा की मांग के अनुरूप संयोजित कर दिया है। एक प्रकार से ये नायिकांए मेरे चेतन तथा यथार्थ के संयोग का प्रतिफलन हैं।आदिवासी समाज की चेतना अब जागृत होने लगी है पर अब तक उनका सारा कुछ लुट चुका है। सोनभद्र की बात करें तो इस क्षेत्र को संविधान की अनुसूची पांच के अधीन होना चाहिए था पर अब तो बात खतम हो गईं आदिवासियों की जमीनंे वन प्रबंधन ने वन अधिनियम की धारा बीस व चार के द्वारा छीन लिया है। फिर भी आशा है कि वे किसी दिन अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे।मुझे कोई पुरस्कार नहीं मिला है और न ही मुझे पुरस्कार चाहिए, परस्कार मिलेगा भी नहीं। मेरा पुरस्कार तो पाठकों की प्रतिक्रियांए हैं। पाठकों का दुलार मिल जाए यही बहुत है मेरे लिए।किसानों कें बारे में जानना हो तो मेरे उपन्यासों को पढ़ लीजिए सारा कुछ उसी में है, मैं भी किसान हूं मुझे पता है कि किसान आज के समय में कहां है उसके लिए न पढ़ाई, न दवाई, न रोजगार, किसानी से दो जून की रोटी भी नहीं मिल सकती।मेरे उपन्यासों में वर्णित समस्याएं मेरे आस-पास की ही हैं, अपने आस-पास से बाहर मैं जादुई कल्पनाओं में नहीं जाता।24- मैं तो अपनी अस्मिता से संतुष्ट हूॅ संतुष्ट वे नहीं हैं जो नामधारी हैं, जमे हुए है वे भी रो रहे है जो संघर्षशील है वे भी, रोना दोनो तरफ से है, बड़े रो रहे हैं कि उनकी किताबें कोर्स की किताबे नहीं बन पा रहीं, संघर्षशील रो रहे कि उन्हें कोई प्रकाशित नहीं कर रहा... ऐसे समय में मुझे तकलीफ होती है....अरे भाई लिखते रहो, कोई छापे न छापे, निराश न होओ पर वे नौकरी पेशा वाले साहित्यकारों की तरफ देखते हैं जिनके दोनों हाथ में लड्डू रहते हैं... जो केवल रायल्टी ही नहीं वेतन भी निचोड़ रहे हैं। देखा जाए तो आज लेखन प्राध्यापकीय तथा प्रशासकीय प्रबंधनों से जुड़े लोगों के हाथ में है। प्रकाशक ऐसे लोगों को किताबें अधिक से अधिक बिकवाने की क्षमता वाला मानता है।बाजारीकरण ने ग्रामवासियों को उपभोक्ता बना दिया है, वे एक कमोडिटी में बदल चुके हैं। गॉवों से सामूहिकता,सहभागिता,सहयोग, समर्पण, पीर पराई जैसी संवेदनाएं अब गायब हो चुकी है। गॉव अब कठोर यांत्रिक सोच की तरफ बढ़ने लगे हैं। अब वहां ‘अहा ग्राम्य जीवन’ देखना, महसूसना मूर्खता है।पाश्चात्य संस्कृति तो अब गॉवों की जड़ों में शामिल हो चुकी है। भाषा के अर्थ में नर्सरी स्कूलों के माध्यम से अंग्रेजी गॉवों में घुस रही है, भूसा के मामले में अधिकारियों की नकल में जीन्स पैन्ट, धोती गायब, साड़ियों की जगह पर विदेशी अधकटे कपड़े, बारामदा, कउड़ा तथा चौपाल गायब। हल बैल की जगह ट्रेक्टर थ्रेसर आ गये हैं सो अब गॉव तो हैं पर गॉव की 19वीं सदी वाले नहीं हैं। गॉव ही नहीं बच पा रहे है फिर ग्रामीण संस्कृति, पर्व, उत्सव, कैसे बचेंगे हालांकि अभी कुछ बचे हुए हैं। देखिए आगे क्या होता है सभ्यता के डिजिटिलाइजेसन के दौर में। कब तक हम स्क्रीन में बदल जाते है। देखना यही है।
शिवेन्द्र.७३७६९००८६६
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